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तीन एकांत
Overview
निर्मल वर्मा की तीन कहानियों (‘धूप का एक टुकड़ा’, ‘डेढ़ इंच ऊपर’ और ‘वीकएंड’) की मंच-प्रस्तुति के दौरान, एक निर्देशक के नाते यह बात शुरू से ही मेरे सामने साफ़ थी कि मुझे कहानियों के ‘नाटकीय रूपान्तर’ की ओर नहीं बढ़ना, वरन् कहानी के अपने मूल ‘फ़ॉर्म’ में निहित कथ्य, शब्द और दृश्य को ही मंच पर स्थापित करना है। कहानी को सुनते हुए अथवा—उससे भी आगे-पढ़ते हुए श्रोता अथवा पाठक के सामने जो एक पूरा दृश्य-जगत बनता चलता है, उसे मंच पर कैसे प्रस्तुत किया जाए ? इसीलिए यह प्रयोग कहानी को सुनने और पढ़ने से आगे की कड़ी तो है ही, लेकिन इसे नाटक अथवा फ़िल्म की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती। शायद यह अनुभव ‘कहानियों का रंगमंच’ जैसी अपनी कोई संज्ञा उत्पन्न कर सके, इसका अभी मात्र एक संकेत ही दिया जा सकता है।
इन तीनों की कहानियों की मंच-प्रस्तुति जिस तरह से विकसित होती चली गई—उस रचना-प्रक्रिया में से गुज़रते हुए उपर्युक्त प्रश्न, निष्कर्ष सम्भवतः और भी स्पष्ट हो सकें।
संयोग से तीनों कहानियों की भावभूमि और ‘फ़ॉर्म’ लगभग एक-जैसा लगा—तीनों में एक-एक पात्र है जो शुरू से लेकर अन्त तक एक लम्बा संवाद (मोनोलॉग) बोलता है, इसके साथ ही यह एक अहसास भी बना रहता है कि संवाद की शुरूआत किसी दूसरे पात्र के साथ होती है, लेकिन यहाँ उसकी स्थिति का कोई अर्थ नहीं रहता, क्योंकि न जाने कब यह संवाद मात्र स्व-केन्द्रित होकर रह जाता है। इस प्रकार ये कहानियाँ अकेलेपन के कुछ क्षणों में पात्रों के स्वयं अपने से साक्षात्कार की कहानियाँ हैं—इस मूल थीम को रेखांकित करने के लिए ही प्रस्तुति को एक सम्मिलित नाम ‘थ्री टेक्स्ट्स इन सॉलीट्यूड’ दिया गया था।
इन तीनों की कहानियों की मंच-प्रस्तुति जिस तरह से विकसित होती चली गई—उस रचना-प्रक्रिया में से गुज़रते हुए उपर्युक्त प्रश्न, निष्कर्ष सम्भवतः और भी स्पष्ट हो सकें।
संयोग से तीनों कहानियों की भावभूमि और ‘फ़ॉर्म’ लगभग एक-जैसा लगा—तीनों में एक-एक पात्र है जो शुरू से लेकर अन्त तक एक लम्बा संवाद (मोनोलॉग) बोलता है, इसके साथ ही यह एक अहसास भी बना रहता है कि संवाद की शुरूआत किसी दूसरे पात्र के साथ होती है, लेकिन यहाँ उसकी स्थिति का कोई अर्थ नहीं रहता, क्योंकि न जाने कब यह संवाद मात्र स्व-केन्द्रित होकर रह जाता है। इस प्रकार ये कहानियाँ अकेलेपन के कुछ क्षणों में पात्रों के स्वयं अपने से साक्षात्कार की कहानियाँ हैं—इस मूल थीम को रेखांकित करने के लिए ही प्रस्तुति को एक सम्मिलित नाम ‘थ्री टेक्स्ट्स इन सॉलीट्यूड’ दिया गया था।
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Book details & editions
| ISBN | 8126710624 |
| Publisher | राजकमल प्रकाशन |
| Publication date | January 1976 |
| Language | Hindi |
| Pages | 75 pages |
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