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प्राग [Prague]
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क्या कोई जगह आपको इसलिए बुलाती है क्योंकि आप पहले से वहाँ रह चुके होते हैं—अपने भीतर? यह उपन्यास एक ऐसे मनुष्य की यात्रा है जो शहरों में भटकता हुआ, दरअसल अपने भीतर ठहरने की जगह खोज रहा है। लंदन की ठंडी सड़कों से लेकर यूरोप की धुँधली गलियों तक, और अंततः प्राग की पुरानी दीवारों तक—यह कहानी बाहरी यात्राओं से ज़्यादा एक गहरी आंतरिक यात्रा है। लेखक अपने अनुभवों, स्मृतियों और बेचैन प्रश्नों के साथ पाठक को उस जगह ले जाता है जहाँ समय रुक जाता है—जहाँ सवालों के उत्तर नहीं, बल्कि स्वीकार मिलते हैं। यह उपन्यास प्रेम, अकेलेपन, स्मृति और आत्म-स्वीकृति के बीच झूलता हुआ यह पूछता है— क्या हम सच में कभी ठहर पाते हैं? काफ्का, दोस्तोएव्स्की और यूरोपीय साहित्य की छाया में लिखी गई यह रचना उन पाठकों के लिए है जो कहानियों में केवल कथानक नहीं, अपने ही भीतर की परछाइयाँ ढूँढते हैं। यह किताब उनके लिए है— जो लगातार यात्रा करते हैं, पर कहीं टिक नहीं पाते जो अपने दुःख गिनते हैं, सुख नहीं और जो मानते हैं कि किसी शहर से ज़्यादा ज़रूरी है, खुद से मिल पाना “प्राग” इस उपन्यास में केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक पुकार है— खुद से मिलने की, खुद को समझने की, और थोड़ी देर के लिए ही सही, ठहर जाने की।
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Book details & editions
| ISBN | 8199333995 |
| Publisher | Khyaati Prakashan |
| Publication date | January 2026 |
| Language | Hindi |
| Pages | 176 pages |
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